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बैल का दूध:- बहुत समय पहले की बात है, विजयनगर नाम का एक खुशहाल राज्य था। वहां के राजा थे महाराज विक्रम सिंह। महाराज बहुत ही न्यायप्रिय थे, लेकिन उन्हें पहेलियाँ (Riddles) सुलझाने और अपने मंत्रियों की बुद्धिमानी की परीक्षा लेने का बहुत शौक था। उनके दरबार में एक मंत्री थे, जिनका नाम था 'सुमति'। सुमति अपनी हाज़िरजवाबी और बुद्धिमानी के लिए पूरे राज्य में प्रसिद्ध थे। अक्सर महाराज जानबूझकर सुमति को फंसाने के लिए अजीबोगरीब सवाल पूछते थे, लेकिन सुमति हमेशा बच निकलते थे।
महाराज की असंभव मांग
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एक दिन दरबार लगा हुआ था। महाराज विक्रम का मूड थोड़ा शरारती था। उन्होंने सोचा, "आज सुमति को कोई ऐसा काम दिया जाए जो नामुमकिन हो। देखें वह कैसे बचता है।" महाराज ने गंभीर चेहरा बनाया और बोले, "मंत्री सुमति! हमारे शाही वैद्य ने बताया है कि हमें एक विशेष औषधि बनानी है, जिसके लिए 'बैल का दूध' (Bull's Milk) चाहिए। राज्य में सिर्फ तुम ही सबसे चतुर हो, इसलिए हम तुम्हें आदेश देते हैं कि कल शाम तक हमारे लिए एक लोटा बैल का दूध लेकर आओ।"
पूरा दरबार सन्न रह गया। सब जानते थे कि बैल दूध नहीं देता, दूध तो गाय देती है। यह तो प्रकृति के नियम के खिलाफ है। लेकिन महाराज का आदेश था, उसे टाला नहीं जा सकता था। सुमति ने विनम्रता से सिर झुकाया और कहा, "जी महाराज, मैं कोशिश करूँगा।" लेकिन अंदर ही अंदर वह बहुत परेशान थे। हिंदी कहानियां में अक्सर राजा अपने मंत्रियों की परीक्षा लेते हैं, लेकिन यह परीक्षा तो सिर पैर से परे थी।
सुमति की चिंता और बेटी का सवाल
सुमति जब घर पहुँचे तो उनका चेहरा लटका हुआ था। उन्होंने खाना भी नहीं खाया। उनकी 10 साल की बेटी, 'आराध्या', जो बहुत ही समझदार थी, ने अपने पिता को परेशान देखा। "पिताजी, क्या बात है? आज आप बहुत चिंतित लग रहे हैं," आराध्या ने पूछा। सुमति ने सिर पकड़ते हुए कहा, "बेटी, महाराज ने एक असंभव मांग रख दी है। उन्होंने मुझसे बैल का दूध लाने को कहा है। अब तुम ही बताओ, बैल भला दूध कैसे दे सकता है? अगर मैं कल दूध नहीं ले गया, तो महाराज नाराज हो जाएंगे और शायद मुझे मंत्री पद से हटा दें।"
आराध्या थोड़ी देर चुप रही, फिर उसकी आँखों में एक चमक आ गई। वह मुस्कुराई और बोली, "पिताजी, आप चिंता मत कीजिए। आप आराम से खाना खाइए और सो जाइए। कल इस समस्या का हल मैं निकाल लूँगी।" सुमति जानते थे कि आराध्या बहुत चतुर और साहसी बच्ची है, इसलिए उन्हें थोड़ी राहत मिली।
आधी रात का नाटक
योजना के मुताबिक, अगली रात जब पूरा शहर सो रहा था, आराध्या ने कपड़ों का एक बड़ा गट्ठर उठाया। वह राजमहल के ठीक पीछे बहने वाली नदी के किनारे पहुँच गई। यह वह जगह थी जहाँ महाराज के शयनकक्ष की खिड़की खुलती थी। आधी रात को सन्नाटे में, आराध्या ने जोर-जोर से कपड़े धोना शुरू कर दिया। धप! धप! धप! कपड़े पटकने की आवाज़ शांत रात में बहुत तेज गूँज रही थी।
महाराज विक्रम गहरी नींद में सो रहे थे। अचानक शोर सुनकर उनकी नींद खुल गई। वे गुस्से में अपनी खिड़की पर आए और चिल्लाए, "कौन है वहां? इतनी रात गए कौन शोर मचा रहा है? पहरेदारों! जाओ और उस व्यक्ति को तुरंत पकड़कर हमारे सामने पेश करो।"
दरबार में पेशी और तर्क
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पहरेदार दौड़कर नीचे गए और आराध्या को पकड़ लिया। वे उसे महाराज के सामने ले आए। महाराज ने देखा कि एक छोटी सी बच्ची भीगे हुए कपड़ों में खड़ी है। महाराज ने कड़क आवाज़ में पूछा, "बच्ची! तुम कौन हो और इतनी आधी रात को नदी पर कपड़े क्यों धो रही थी? क्या तुम्हें पता नहीं कि इससे हमारी नींद खराब हुई है?"
आराध्या ने भोलेपन का नाटक करते हुए हाथ जोड़कर कहा, "क्षमा करें महाराज! मैं मंत्री सुमति की बेटी हूँ। मैं क्या करती? मैं मजबूर थी।" महाराज ने हैरान होकर पूछा, "ऐसी क्या मजबूरी थी कि तुम्हें दिन में समय नहीं मिला?"
आराध्या ने कहा, "महाराज, आज शाम को मेरे पिताजी ने एक प्यारे से बच्चे को जन्म दिया है। घर में कोई और नहीं था, तो मुझे ही उस बच्चे की देखभाल करनी पड़ी। सारा दिन पिताजी की सेवा और नन्हे बच्चे के काम में निकल गया। कपड़े बहुत गंदे हो गए थे, इसलिए अभी रात को धोने आई थी।"
महाराज का गुस्सा और सच का सामना
यह सुनते ही महाराज विक्रम का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। वे हँसे और फिर गुस्से से बोले, "क्या मूर्खतापूर्ण बात कर रही हो! क्या कभी कोई आदमी बच्चे को जन्म दे सकता है? यह तो प्रकृति के नियम के खिलाफ है। तुम झूठ बोल रही हो!"
आराध्या ने शांत भाव से, बिना डरे, महाराज की आँखों में देखा और मुस्कुराते हुए कहा, "महाराज! अगर आदमी का बच्चा पैदा करना नामुमकिन है, तो बैल का दूध देना कैसे मुमकिन हो सकता है?"
महाराज विक्रम एकदम चुप हो गए। उन्हें समझते देर नहीं लगी कि यह बच्ची उन्हें उन्हीं के जाल में फंसा रही है। उन्हें अपनी गलती और उस असंभव मांग की निरर्थकता समझ आ गई।
बुद्धिमानी की जीत
महाराज जोर से हँस पड़े। उन्होंने अपनी गद्दी से उठकर आराध्या के सिर पर हाथ रखा। "शाबाश बेटी! तुमने हमारी आँखें खोल दीं। वाकई, सुमति की बेटी उनसे भी ज्यादा होशियार है।" महाराज ने अपना आदेश वापस ले लिया और आराध्या को उसकी बुद्धिमानी के लिए ढेर सारे उपहार दिए। अगले दिन दरबार में सुमति का सिर गर्व से ऊँचा था।
यह कहानी हमें सिखाती है कि अगर हम सूझबूझ से काम लें, तो बड़ी से बड़ी और अजीबोगरीब समस्याओं का भी समाधान निकाल सकते हैं। तर्क (Logic) ही सबसे बड़ा हथियार है।
इस कहानी से सीख (Moral of the Story):
तर्क शक्ति: हर समस्या का हल ताकत से नहीं, बल्कि सही तर्क और बुद्धि से निकलता है।
साहस: अपनी बात को सही तरीके से रखने के लिए निडर होना ज़रूरी है, चाहे सामने राजा ही क्यों न हो।
- जैसे को तैसा: कभी-कभी किसी को उसकी गलती का अहसास दिलाने के लिए उसी की भाषा में जवाब देना पड़ता है।
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